जैन विश्व भारती में 'वेश और साधुता' विषय पर बही अमृत देशना;बिना साधु-वेश के भी मरुदेवा माता और चक्रवर्ती भरत को मिला मोक्ष

लाडनूं। 09 जुलाई, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'वेश और साधुता' विषय पर पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से कुमार श्रमण केशी और गौतम स्वामी के ऐतिहासिक संवाद का प्रसंग रखते हुए फरमाया कि वेश और साधुता दो अलग-अलग चीजें हैं। वस्त्र या उपकरण केवल बाहरी पहचान हैं, मूल साधुता आत्मा के भीतर होती है।
वेश, लिंग और धर्मोपकरण के ३ मुख्य कारण : पूज्यप्रवर ने व्यवहार जगत में साधु वेश धारण करने के तीन प्रमुख व्यावहारिक कारण स्पष्ट किए।
१. लोक प्रतीति (पहचान): वेश से समाज में यह पहचान होती है कि ये साधु हैं, ताकि लोग उनके पास आकर धार्मिक ज्ञान ले सकें और उनके सम्प्रदाय को समझ सकें।
२. जीवन यात्रा का निर्वाह : सर्दी-गर्मी आदि मौसम से शरीर के बचाव और जीवन यात्रा को सुचारू रूप से चलाने के लिए वेश और वस्त्रों की अपेक्षा होती है।
३. आत्म-बोध (स्वयं को ध्यान रहना) : गृहस्थों से अलग वेश साधु को हर पल यह अहसास कराता रहता है कि 'मैं साधु हूँ' और मुझे किसी भी गलत कार्य या आचरण से बचना है।
साधुता के लिए वेश अनिवार्य नहीं, ज्ञान-दर्शन-चारित्र ही मूल : आचार्यश्री ने आध्यात्मिक गहराई को छूते हुए परम सत्य को सामने रखा।
१. व्यवहार और निश्चय का भेद : वेश केवल व्यवहार की चीज़ है। निश्चय (आध्यात्मिक) दृष्टि से देखें तो वेश के बिना भी साधुता संभव है। साधुता मुखवस्त्रिका, रजोहरण या वस्त्रों में नहीं है।
२. बिना वेश के भी मोक्ष : मरुदेवा माता और चक्रवर्ती भरत को गृहस्थ वेश में ही केवलज्ञान (परम ज्ञान) की प्राप्ति हो गई थी। मोक्ष के लिए वेश नहीं, बल्कि ज्ञान, दर्शन और चारित्र अनिवार्य हैं।
३. मर्यादा का ध्यान : वर्तमान में सभी संप्रदायों में अपने-अपने वेश की व्यवस्था है। हमें भी हमारे संप्रदाय की मर्यादा और व्यवस्था के प्रति हमेशा सजग रहना चाहिए। प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।