'वंदना से क्या मिलेगा?' विषय पर पूज्य प्रवर का मार्मिक बोध; माता–पिता और गुरुजनों की वंदना को बताया संसार का श्रेष्ठ शिष्टाचार

लाडनूं।  18 अगस्त, 2026
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता,शांतिदूत युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती परिसर में ‘वंदना से क्या मिलेगा?’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान किया।
वंदना की महिमा व विधि:
१. तीसरा आवश्यक : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि षडावश्यक में तीसरा आवश्यक 'वंदना' है। परमेष्ठी वंदना में अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं की वंदना की जाती है।
२. मस्तक झुकाना ही सच्ची भक्ति : वंदना के दौरान शिष्य, गुरु की आज्ञा लेकर प्रविष्ट होता है और अपना मस्तक गुरु के चरणों में रख देता है। अपने उत्तमांग को गुरु के चरणों में लगाना भक्ति का सर्वोच्च प्रतीक है।
३. वंदना की परंपरा : गृहस्थ एवं साधु-साध्वी 'तिक्खुत्तो' (तीन बार) उठ-बैठकर वंदन करते हैं। बहिर्विहारी साधु-साध्वियां गुरु की दिशा में मुंह करके वंदन करते हैं। परंपरा में आचार्य स्वयं भी अपने से रत्नाधिक (दीक्षा में वरिष्ठ) मुनियों को नतमस्तक होकर वंदना करते हैं।
विनयशीलता और आचार्यों के महान उदाहरण:
१. गुरुदेव तुलसी व आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की परिपाटी : आचार्यश्री ने स्मरण कराया कि आचार्य श्री तुलसी रत्नाधिक संतों को सड़क पर ही नीचे विराजकर वंदन करते थे। वहीं, आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी भी प्रवचन देने जाने से पूर्व सदैव गुरुदेव तुलसी के पास जाकर वंदना व आज्ञा प्राप्त करते थे।
२. विनम्रता ही वंदना का प्राण: विद्वान संतों द्वारा अपने से वरिष्ठ मुनियों का चरण स्पर्श करना महान भक्ति का लक्षण है। गुरु से आज्ञा लेकर कार्य करना शिष्टता और मर्यादा का प्रतीक है।
नीच गोत्र का क्षय और आदेय वचन की प्राप्ति:
१. गोत्र कर्म की निर्जरा : आगम के अनुसार, वंदना करने से जीव नीच गोत्र कर्म का क्षय (निर्जरा) करता है और उच्च गोत्र का बंधन करता है।
२. आज्ञा की स्वीकार्यता :  निष्काम वंदना से व्यक्ति का प्रभाव और वचन ऐसा आदेय बनता है कि उसकी बात या आज्ञा को समाज में सहर्ष स्वीकार किया जाता है।
३. मद का वर्जन : जाति, कुल, सुंदरता, रूप, बल और तपस्या पुण्य के योग से मिलते हैं, लेकिन इनका अहंकार नहीं करना चाहिए। सुंदरता से बड़ी चीज भावों की निर्मलता और ज्ञान की विशिष्टता है। वंदना से अहंकार क्षीण होता है और जीवन में सर्वत्र आदर प्राप्त होता है।