'निंदा से क्या मिलेगा?' विषय पर पूज्य प्रवर ने दी पावन देशना; न्याय के आसन पर बैठने वाले को निष्पक्ष, निर्भीक और निर्लोभ होने का दिया संदेश

लाडनूं। 13 अगस्त, 2026
जन-जन को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का संदेश प्रदान करने वाले जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘निंदा से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की।
पर-निंदा १८ पापों में एक, लेकिन नीयत और लक्ष्य है महत्वपूर्ण–
१.दूसरों की निंदा पाप का कारण: पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि जो दूसरों की निंदा करता है, वह १८ पापों में से एक पाप का आचरण करता है।
२.सच्चाई और परिष्कार का लक्ष्य: यदि किसी के बारे में कोई प्रतिकूल बात हो और वह सच्ची भी हो, तो अवसर देखकर सही बात बताना जरूरी हो सकता है। उसमें हर बार निंदा का पाप नहीं लगता। आदमी की प्रवृत्ति के पीछे उसका भाव और लक्ष्य क्या है, यह सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि लक्ष्य परिष्कार (सुधार) का है और किसी को बदनाम करना उद्देश्य नहीं है, तो सच्ची बात प्रकट करना भी आवश्यक हो जाता है।
३.लोंच का सुंदर दृष्टांत: आचार्यश्री ने उदाहरण देते हुए समझाया कि क्रोध में आकर किसी के बाल खींचना पाप का कार्य है, लेकिन जब हमारे संत या साध्वियां साधुचर्या के निर्वाह के लिए ‘लोंच’ (केशलोंच) करते हैं, तो दोनों के भावों में बड़ा अंतर होता है। लोंच करना एक तरह से सेवा और निर्जरा का कार्य बन जाता है। इसलिए नीयत से परिणाम बदल जाता है। ४.प्रमाण और विवेक: किसी की शिकायत या बात करते समय बात में सच्चाई और प्रमाण होना चाहिए। बोलने और न बोलने में विवेक रखना ही हमारा सच्चा धर्म और कर्तव्य है।
न्याय के आसन पर बैठने वाला भगवान का रूप; निष्पक्षता अनिवार्य–
१.दोनों पक्षों की सुनवाई जरूरी: शिकायत करने वाले और जिसकी शिकायत हो रही है, दोनों की बातें ध्यान से सुनने के बाद ही अपनी बात या निर्णय रखना चाहिए। न्याय के क्षेत्र में स्पष्टता होनी चाहिए कि जल्दबाजी में किसी बेगुनाह या निर्दोष को दंड न मिले।
२.न्यायाधीश के गुण : न्याय के आसन पर बैठने वाले व्यक्ति को मानो भगवान के रूप में बैठकर न्याय करना चाहिए। न्याय करने वाले में निष्पक्षता, निर्भीकता और निर्लोभता होनी चाहिए। जिसके मन में भय या लालच आ जाए, उसके न्याय में समस्या पैदा हो सकती है।
'आत्म-निंदा' से पश्चाताप, क्षपक श्रेणी और १२वें गुणस्थान की प्राप्ति–
१.आत्म-निंदा का वास्तविक अर्थ: आगम में जिस 'निंदा' को उपादेय बताया गया है, उसका अर्थ है—आत्म-निंदा। यानी गुरु या स्वयं के समक्ष अपनी गलती के प्रति अनादर का भाव प्रकट करना।
२.कर्मों का क्षय: आगम के अनुसार आत्म-निंदा से मन में पश्चाताप का भाव पैदा होता है। पश्चाताप से जीव अपनी गलती से दूर हटता है और विरक्त होता है।
३.१२वें गुणस्थान की प्राप्ति: विरक्त होते-होते साधक 'करण गुण श्रेणी' यानी क्षपक श्रेणी को प्राप्त कर लेता है। इस मार्ग पर आगे बढ़ते-बढ़ते साधक १२वें गुणस्थान में पहुँचकर मोहनीय कर्म का पूरी तरह क्षय कर देता है। अतः आत्म-निंदा कर्म निर्जरा और आत्म-शुद्धि का मुख्य हेतु है।
४.समाधि की साधना: साधु जीवन में साधना की निर्मलता के प्रति जागरूकता और चित्त में समाधि रहनी चाहिए। 
नेपाल के पूर्व राष्ट्रपति ने पत्र भेजकर दी बधाई–
युवाचार्य नियुक्ति पर शुभकामनाएं : बीते दिनों आचार्यश्री महाश्रमण जी द्वारा युवाचार्य श्री की नियुक्ति किए जाने के पावन अवसर पर नेपाल के पूर्व राष्ट्रपति रामबरण यादव ने बधाई पत्र भेजकर अपनी मंगलकामनाएं प्रेषित कीं।
इस शुभकामना पत्र का वाचन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।