आलोचना से क्या मिलेगा?' विषय पर पूज्य प्रवर ने दी पावन देशना; गुरु के सामने निष्कपट होकर दोष स्वीकारने को बताया आत्म-शुद्धि का मार्ग

लाडनूं। 12 अगस्त, 2026
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, धर्मधुरंधर,  युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘आलोचना से क्या मिलेगा?’ विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान की।
'आलोचना' क्या है और प्रायश्चित में इसका स्थान?–
१.पहला चरण है आलोचना: आगम में प्रायश्चित के १० प्रकार बताए गए हैं, जिनमें 'आलोचना' पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रकार है। आलोचना का अर्थ है—गुरु या प्रायश्चित दाता के समक्ष स्वयं जाकर अपने दोषों और गलतियों को निष्कपट भाव से प्रकट कर देना।
२.सरलता और बड़प्पन: गलती हो जाने पर पूछे जाने पर भी लोग सच नहीं बोलते, लेकिन बिना पूछे स्वयं आगे बढ़कर गुरु को अपनी चूक बता देना बहुत बड़ा आत्म-बल और बड़प्पन है।
तीन शल्यों का निष्कासन और मोक्ष मार्ग की प्राप्ति–
१. तीन बाधाओं का अंत: पूज्य प्रवर ने फरमाया कि जो व्यक्ति सरलतापूर्वक गुरु के सामने आलोचना करता है, वह माया शल्य, निदान शल्य और मिथ्यादर्शन शल्य—इन तीनों शल्यों (कांटों) को उखाड़ फेंकता है।
२. अनंत संसार से बचाव : ये तीनों शल्य मोक्ष मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं और जीव को अनंत संसार में भटकने पर मजबूर करते हैं। आलोचना करने वाला व्यक्ति ऋजुभाव (सरलता) को प्राप्त कर लेता है, जिससे चित्त में निश्चल निर्मलता आ जाती है।
३. कर्मों की निर्जरा : जो ऋजुभाव को प्राप्त कर लेता है, वह माया से मुक्त हो जाता है। ऐसा जीव स्त्री वेद व नपुंसक वेद का नया बंधन नहीं करता और यदि पहले से कर्म बंधे हों तो उनकी निर्जरा (नाश) कर देता है।
साधु और श्रावक दोनों के लिए संदेश:
१. साधु जीवन में निष्पक्षता : चारित्रात्माओं के लिए आलोचना में सरलता अत्यंत आवश्यक है। गुरु द्वारा दिए गए प्रायश्चित को सहर्ष स्वीकार करने से आत्म-शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। प्रायश्चित दाता को भी निष्पक्ष रहकर प्रायश्चित देना चाहिए।
२.श्रावकों के लिए प्रेरणा: श्रावक-श्राविकाओं को भी अपने त्याग, पच्चक्खान या व्रत-नियमों में लगी भूलों के लिए सरलता से आलोचना कर प्रायश्चित ले लेना चाहिए।