आचार्यश्री प्रदान किया आंतरिक शत्रुओं को जीतने का सक्सेस मंत्र; जीवन को बैलेंस करने के लिए बताए ५ पावरफुल सूत्र

लाडनूं। 10 जुलाई, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'शत्रु कौन है' विषय पर गहन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से कुमार श्रमण केशी और गौतम स्वामी के ऐतिहासिक संवाद का प्रसंग रखते हुए फरमाया कि जब मुनि केशी ने पूछा कि हजारों शत्रुओं के बीच रहकर आपने उन्हें कैसे परास्त किया? तब गौतम स्वामी ने उत्तर दिया कि एक आत्मा जो न जीती हुई है, वही शत्रु होती है। वस्त्र या उपकरण केवल बाहरी पहचान हैं, मूल विजय तो अपने भीतर के शत्रुओं पर पानी होती है।
आगम के अनुसार ये हैं हमारे आंतरिक शत्रु : पूज्यप्रवर ने स्पष्ट किया कि यदि एक आत्मा शत्रु बन जाए, तो उसका पूरा परिवार ही शत्रु की तरह व्यवहार करता है।
१. न जीती हुई आत्मा : जो मन हमारे वश में नहीं है, वही मुख्य शत्रु है।
२. चार कषाय : क्रोध, मान (अहंकार), माया (छल-कपट) और लोभ मनुष्य के बड़े दुश्मन हैं।
३. पांच इन्द्रियां : अनियंत्रित और असंयमित इन्द्रियां जो जीव को सही मार्ग से भटकाती हैं।
गौतम स्वामी ने ज्ञान के उपाय के अनुसार इन सबको जीता है और इन्हें जीतकर ही वे आनंदपूर्वक विहार कर रहे हैं।
जीवन व्यवहार को बदलने वाले ५ पावन सूत्र : आचार्यश्री ने साधु और गृहस्थ दोनों के व्यावहारिक जीवन के लिए ५ मुख्य सूत्रों की आराधना करने की प्रेरणा दी।
१. भाव क्रिया : हम जो भी कार्य करें, यथासंभव हमारा पूरा ध्यान और एकाग्रता उसी कार्य में होनी चाहिए।
२. प्रतिक्रिया विरति : जीवन में कोई भी प्रतिकूल बात सामने आए तो तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें और धैर्य रखें।
३. मैत्री : संसार के सभी प्राणियों के प्रति मन में शुद्ध मैत्री का भाव जाग्रत रहे।
४. मिताहार : शरीर और साधना के निर्वाह के लिए भोजन और आहार का पूरा संयम रहे।
५. मितभाषण : साधु हो या सामान्य मनुष्य, हर किसी को अपनी वाणी पर पूर्ण संयम रखना चाहिए।
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दुनिया जीतना तो खेल...
इन्द्रिय संयम और संतोष ही साधना का मूल: आचार्यश्री ने आध्यात्मिक गहराई को छूते हुए परम सत्य को सामने रखा:
१. कषायों पर विजय : अध्यात्म की दृष्टि से कषायों पर विजय प्राप्त करना बहुत उच्च कोटि की साधना है।
२. वीतरागता की दिशा : वर्तमान समय में यदि पूर्ण वीतरागता उपलब्ध न भी हो, तो हमें ज्यादा से ज्यादा उसकी दिशा में गति करनी चाहिए।
३. साधु के लक्षण : साधु को सरल, भद्र और विनीत होना चाहिए तथा छल-कपट और अहंकार से दूर रहना चाहिए।
४. समता का भाव : हमारे भीतर सेवा की भावना हो तथा सेवा लेने और देने वाले, दोनों के मन में समता व शांति रहे।