भावात्मक ऋजुता और वक्रता' विषय पर अमृत देशना: अनावश्यक बहस और छल-कपट से दूर रहकर ही मिलेगी सच्ची सफलता

लाडनूं। 08 जुलाई, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने ‘भावात्मक ऋजुता और वक्रता’ विषय को विवेचित करते हुए फरमाया कि श्रावस्ती नगरी में एक स्थान पर कुमार श्रमण अपने शिष्य समुदाय के साथ और दूसरे स्थान पर इन्द्रभूति गौतम स्वामी अपने शिष्यों के साथ विराजमान थे। दोनों के शिष्यों ने जब एक-दूसरे के वस्त्रों और नियमों (चातुर्याम व पंच शिक्षात्मक धर्म) में अंतर देखा, तो उनके मन में शंकाएं उठीं। इसी शंका के समाधान के लिए दोनों महापुरुषों ने समागम कर चर्चा करने का विचार किया।
श्रावस्ती नगरी में दो महान संतों का दिव्य समागम : आचार्यश्री ने कालक्रम और इतिहास के झरोखे से दो महान परंपराओं के संतों के मिलन की पृष्ठभूमि स्पष्ट की।
१. चंद्र-सूर्य के समान शोभायमान : गौतम स्वामी अपने शिष्यों के साथ वहां पहुंचे जहां कुमार श्रमण विराजमान थे। कुमार श्रमण द्वारा यथोचित सत्कार के बाद दोनों संत वहां विराजमान हुए, जो मानों चंद्र और सूर्य के समान शोभायमान हो रहे थे।
२. दिव्य शक्तियों का समागम : इस ऐतिहासिक समागमन में हजारों लोगों के साथ-साथ दिव्य शक्तियों की भी उपस्थिति थी।  चातुर्याम धर्म और पंच शिक्षात्मक धर्म की समीक्षा कुमार श्रमण केशी और महामना गौतम स्वामी के बीच हुई आध्यात्मिक चर्चा के संदर्भ में पूज्यप्रवर ने फरमाया।
व्यवस्थागत भेद का कारण : कुमार श्रमण केशी के पूछने पर कि दोनों का साध्य मोक्ष है फिर धर्म के ये दो प्रकार कैसे हो गए? महामना गौतम ने कहा कि प्रज्ञा समीक्षा करती है, ये केवल ऊपरी व्यवस्थागत भेद हैं।
मूल तत्त्व अध्यात्म साधना: चातुर्याम और पंच महाव्रतों के धर्म में काफी समानता है। मूल तत्त्व अध्यात्म की साधना है, आचार और क्रिया में यह अंतर भावात्मक ऋजुता और वक्रता के कारण हो जाता है।
तीर्थंकर व्यवस्था, ऋजुता, वक्रता और जड़ता की स्थिति : आचार्यश्री ने कालखंडों के अनुसार साधुओं के स्वभाव व मति के अंतर को रेखांकित करते हुए प्रमुख बातें कहीं।
१. २४ तीर्थंकरों की व्यवस्था : भरत क्षेत्र में प्रत्येक २४ तीर्थंकरों की व्यवस्था होती है। पहले तीर्थंकर के साधु ऋजु जड़, चौबीसवें तीर्थंकर के साधु वक्र जड़ और शेष बाईस तीर्थंकरों के शिष्य ऋजुप्राज्ञ (सरल और समझदार) होते हैं।
२. स्वभाव और मस्तिष्क का संबंध : स्वभाव का संबंध मोहनीय कर्म से और मस्तिष्क का ज्ञानावरणीय कर्म से है। प्रथम तीर्थंकर के साधु स्वभाव से भले पर कम समझदार होते हैं, जिन्हें समझाना कठिन है। वहीं अंतिम तीर्थंकर के साधु वक्र स्वभाव के होते हैं, जो तर्क देकर मान्य बातों और नियमों में भी गली निकाल लेते हैं।
३.महाव्रतों की आवश्यकता: ऋजु प्राज्ञ साधुओं के लिए चार नियम ही काफी होते हैं, जबकि वक्र जड़ व ऋजु जड़ साधुओं के लिए पांच महाव्रत आवश्यक होते हैं। मोहनीय कर्म हल्का और कषाय मंद हो, तो भावात्मक ऋजुता आ सकती है।
साधु-साध्वियों को स्वभाव में सरलता रखने की प्रेरणा : प्रवचन के अंत में आचार्यश्री ने उत्तम आचरण के लिए पावन पाथेय प्रदान किया।
१. छल-कपट से बचने का संदेश : हम भगवान महावीर के शासन के साधु हैं पर यह जरूरी नहीं कि सभी साधु वक्र हों। हमारे ज्ञान और मति के साथ-साथ स्वभाव में ऋजुता (सरलता) भी होनी चाहिए।
२. सरल और भद्र बनने का प्रयास : साधु को अनावश्यक तर्क, झूठ और छल-कपट से बचना चाहिए। स्वभाव में सरलता हो और आदमी भद्र रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए।