पूज्य आचार्यश्री का 'स्वाध्याय से क्या मिलेगा?' पर आगमिक बोध; आचार्य श्री तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ जी के साधना योगों का दिया प्रेरक उदाहरण

लाडनूं। 26 अगस्त, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती की सुधर्मा सभा में उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को ‘स्वाध्याय से क्या मिलेगा?’ विषय पर पावन अमृत देशना प्रदान की।
स्वाध्याय का अर्थ, मर्यादा और ज्ञान का क्षेत्र :
१. दो प्रकार से संधि-विच्छेद :   पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि स्वाध्याय का पहला अर्थ है 'स्व+अध्याय' यानी अपनी आत्मा के बारे में जानना। दूसरा अर्थ है 'सु+आ+अध्याय' अर्थात् भली-भांति, मर्यादापूर्वक और समग्र रूप से अध्ययन करना।
२. स्वाध्याय की मर्यादा : स्वाध्याय करते समय काल-अकाल की मर्यादा का ध्यान रखें। मन इधर-उधर न भटके, दृष्टि एकाग्र रहे और कक्षा में नियत समय पर पहुँचना चाहिए।
३. श्रुत धर्म व उपाध्याय पद : आगमों का अध्ययन करना स्वाध्याय है, जो श्रुत धर्म और ज्ञान का क्षेत्र है। ज्ञान की दृष्टि से उपाध्याय महाराज स्वयं अध्ययन करने वाले और दूसरों को पढ़ाने वाले होते हैं तथा आचार्य श्री वाचना देते हैं। उपाध्याय जी को ज्ञान का प्रतीक माना जा सकता है।
ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय व बंधन के कारण :
१. कर्म क्षयोपशम और निर्जरा: स्वाध्याय से जीव ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय करता है। हर प्राणी में इसका न्यूनतम क्षयोपशम होता है, अन्यथा जीव अजीव बन जाए। क्षयोपशम की तरतमता के कारण ही किसी में तीक्ष्ण बुद्धि व स्मरण शक्ति होती है, तो किसी में ज्ञान का उतना विकास नहीं हो पाता। स्वाध्याय से इस कर्म का निर्जरण होता है।
२. कर्म बंधन के ४ कारण : ज्ञानावरणीय कर्म बंधन से बचने हेतु सजगता जरूरी है। इसके ४ प्रमुख कारण हैं— 
१. ज्ञान या ज्ञानियों की आशातना करना। 
२. ज्ञान या ज्ञानी से द्वेष रखना।
३. ज्ञान प्राप्ति में बाधा (अंतराय) डालना।
४. उनसे प्रतिकूलता रखना। ज्ञान व ज्ञानी के प्रति सम्मान रखने से यह कर्म हल्का पड़ता है।
कर्म निर्जरा के ४ योग और गुरुदेवश्री के उदाहरण : निर्जरा के ४ योग: 
साधु-साध्वियों व समणियों के लिए कर्म निर्जरा के चार मार्ग हैं—
१. स्वाध्याय योग : आगमों, ग्रंथों के स्वाध्याय, अध्यापन व चिंतन-मनन में समय लगाना।
२. सेवा योग : बीमार, वृद्ध व सेवा के अधिकारी संतों की सेवा और गोचरी-पानी का कार्य करना।
३. तपो योग : क्षमतानुसार अठाई, पखवाड़ा, मासखमण जैसी बड़ी तपस्याएं करना।
४. ध्यान-जप योग :  लोगस्स, नवकार मंत्र जप व कायोत्सर्ग द्वारा निर्जरा करना।
योग का चयन व बदलाव : साधक अपनी क्षमता व रुचि के अनुसार एक योग को मुख्य और अन्य को गौण बनाकर साधना करें। उम्र या क्षमता के अनुसार इसमें बदलाव भी संभव है; जैसे युवावस्था में सेवा योग और बाद में जप-ध्यान योग अपनाया जा सकता है।
आचार्य प्रवर के प्रेरक उदाहरण : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के जीवन में 'स्वाध्याय योग' मुख्य था, जबकि आचार्य श्री तुलसी के जीवन में 'स्वाध्याय और सेवा योग' प्रधान था।