आचार्यश्री ने 'वाचना से क्या मिलेगा?' पर दिया बोध; दूसरों को ज्ञान देना और अध्यापन कराना महान निर्जरा

लाडनूं। 28 अगस्त, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में निर्धारित विषय ‘वाचना से क्या मिलेगा?’ पर आगम आधारित पावन देशना प्रदान करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को ज्ञान व साधना से आप्लावित किया।
वाचना का अर्थ, श्रुत आराधना और निर्जरा की महिमा :
१. स्वाध्याय का मुख्य अंग वाचना : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि स्वाध्याय के प्रसिद्ध पांच प्रकारों 
में पहला प्रकार वाचना है। वाचना का अर्थ है शिष्यों को ज्ञान देना और अध्यापन कराना।
२. महान तप व निर्जरा का माध्यम : स्वाध्याय को सबसे बड़ा तप माना गया है, जिसके समान दूसरा कोई तप नहीं है। वाचना स्वाध्याय का ही अंग है। किसी को ज्ञान देने व पढ़ाने से साधक शुभ योग में रहता है, जिससे ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय और महान निर्जरा होती है।
३. श्रुत आराधना यानी जिनेश्वर की आराधना: वाचना करते समय साधक श्रुत की अनाशातना में रहता है, जो श्रुत का बहुत बड़ा सम्मान है। जो श्रुत की आराधना करते हैं, वे वस्तुतः जिनेश्वर भगवान की आराधना करते हैं। 
वाचना देने वाला तीर्थ धर्म (प्रवचन) का अवलंबन लेता है और गणधरों तथा आचार्यों की शास्त्रीय श्रुत-परंपरा को अविच्छिन्न बनाए रखने में योगदान देता है।
तेरापंथ की व्यवस्था, ४ योग व सेवा भावना :
१. एक आचार्य में सन्निहित पद : धर्मसंघ में अध्ययन करने वाले साधु-साध्वी योग्य और बहुश्रुत बनते हैं। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि यद्यपि तेरापंथ धर्मसंघ में उपाध्याय आदि अलग पदों की व्यवस्था नहीं है और सभी पद एक आचार्य में ही सन्निहित हैं, फिर भी ज्ञान-साधना का क्रम निरंतर गतिमान रहता है।
२. युवा साधु-साध्वियों को सेवा की प्रेरणा :  आचार्यश्री ने पुनः चार योगों (स्वाध्याय, सेवा, तप, ध्यान-जप) की चर्चा करते हुए फरमाया कि जिनकी आयु कम है और क्षमता है, उन्हें औपचारिक चाकरी के अलावा आवश्यकता पड़ने पर स्वयं को अनौपचारिक सेवा कार्यों में नियोजित करना चाहिए।
साध्वी प्रमुखा श्री जी के विचार :  साध्वी प्रमुखा जी ने कहा कि योगक्षेम वर्ष में अध्ययन-अध्यापन का उत्कृष्ट क्रम चल रहा है। साध्वियों में गहरा सेवा-भाव और निर्जरार्थता है, उन्होंने तपस्या के दौरान बिना कहे समर्पित भाव से सेवाएं दी हैं।
मोक्ष-समाधि का लक्ष्य और रक्षाबंधन का पावन संदेश :
१. समाधि व मोक्ष की प्राप्ति: वाचना करने वाला और श्रुत परंपरा को आगे बढ़ाने वाला साधक महा-निर्जरा अर्जित कर मोक्ष प्राप्त करता है अथवा अंत समय में समाधि-मरण को प्राप्त होता है।
२. रक्षाबंधन पर आत्म-रक्षा का संदेश : रक्षाबंधन पर्व के संदर्भ में पूज्य प्रवर ने फरमाया कि यह भाई-बहन का त्यौहार है, लेकिन इसका मुख्य सार 
रक्षा है। हमें अपनी आत्मा को बुराइयों और पाप कर्मों के बंधन से बचाना चाहिए। आत्मा को पापों से बचाना ही सबसे बड़ी रक्षा है।