आचार्यश्री ने दिए मुक्ति के ४ अचूक सूत्र; फरमाया—दुराग्रह छोड़ो और आग्रहहीन चिंतन के द्वार हमेशा खुले रखो

लाडनूं। 11 जुलाई, 2026
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'पाश बहुल संसार: कैसे मुक्त विहार?' विषय पर पावन अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से महात्मा केशी और महात्मा गौतम के ऐतिहासिक संवाद का प्रसंग रखते हुए फरमाया कि जब मुनि केशी ने पूछा कि इस पाश बद्ध संसार में रहते हुए भी आप मुक्त रहकर कैसे विहार कर रहे हो? तब गौतम स्वामी ने उत्तर दिया कि संसार के जितने भी पाश हैं, उन्हें मैंने उपाय पूर्वक काट दिया है और अब मैं मुक्त पाश व लघुभूत होकर आनंदपूर्वक विहार कर रहा हूँ।
आगम के अनुसार ये हैं संसार के वे भयंकर पाश : पूज्यप्रवर ने विस्तार से स्पष्ट किया कि संसार में प्राणी किन अदृश्य बंधनों में जकड़ा हुआ है और साधु की स्थिति उससे कैसे भिन्न होती है।
१. राग, द्वेष और स्नेह का बंधन : महात्मा गौतम स्वामी के अनुसार इस संसार में प्राणी सबसे ज्यादा राग, द्वेष और स्नेह के भयंकर पाशों में बंधा हुआ है, जो जीव के पतन का मूल कारण बनते हैं।
२. मोह का गहरा जाल : गृहस्थ लोग जीवन भर स्नेह और मोह के पाश में बुरी तरह फंसे रहते हैं। उनके लिए धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और कुल-खानदान आदि ही वे सांसारिक पाश हैं, जिससे मानव पूरी तरह आबद्ध रहता है।
३. साधु की संबंधातीत दुनिया : साधु की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह हर प्रकार के सांसारिक संयोगों से विप्रमुक्त होता है। जैसे कमल पानी के भीतर रहकर भी उससे अलिप्त रहता है, ठीक वैसे ही साधु इन तीव्र पाशों का छेदन कर संसार के बीच रहते हुए भी अलिप्त रहता है।
४.धार्मिक संगठन का प्रोटोकॉल: आचार्यश्री ने फरमाया कि दीक्षा लेकर हमने एक छोटे परिवार को भले ही छोड़ दिया हो, किन्तु अब हम धर्मसंघ के एक बहुत बड़े परिवार में आ गए हैं। इस धार्मिक संगठन के अपने विशेष रीति-रिवाज और प्रोटोकॉल होते हैं, जिनका निष्ठापूर्वक पालन करना कर्तव्य है।
पाशों से मुक्ति के अचूक उपाय और पावन सूत्र: आचार्यश्री ने इन आत्मिक बंधनों को हमेशा के लिए काटने और साधना पथ को सुदृढ़ बनाने के लिए गहरे व्यावहारिक सूत्र प्रदान किए।
१. अन्यत्व भावना का गहरा प्रयोग : जीवन में १२ अथवा १६ अनुप्रेक्षाओं का निरंतर उपयोग करके हम अपने राग-द्वेष के भावों को कम कर सकते हैं। अनित्य और अशरण आदि भावनाओं का अनुचिंतन करें कि यह आत्मा बिल्कुल अलग है और ये सांसारिक लोग अलग हैं; व्यवहार में चाहे जितने संबंध हों, पर निश्चय में आदमी हमेशा अकेला ही होता है।
२. राग से क्रमिक मुक्ति की अनिवार्यता : संसार में किसी के प्रति द्वेष की भावना से मुक्त होना तो अपेक्षाकृत सरल है, परन्तु पूर्णतया राग का नाश सबसे अंत में यानी बारहवें गुणस्थान में ही संभव होता है। जब तक आत्मा से राग पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, तब तक कोई भी साधु पूर्ण वीतराग नहीं बन सकता।
३. आग्रहहीन चिंतन के द्वार : वर्तमान समय में यदि पूर्णतया राग की समाप्ति न भी हो सके, तो भी निरंतर राग-द्वेष को कम करने की साधना का प्रयास अवश्य करना चाहिए। साधु के भीतर दुराग्रह के रूप में कभी राग नहीं होना चाहिए, बल्कि ज्ञान की अच्छी बात जहाँ से भी प्राप्त हो, उसे ग्रहण करने के लिए चिंतन के द्वार हमेशा खुले रखने चाहिए।
४. दोहरे दृष्टि राग से पूर्ण बचाव: साधु को अपने दर्शन या सिद्धान्त के प्रति दुराग्रह रूपी राग से हमेशा दूर रहना चाहिए, क्योंकि यह दृष्टि राग का ही एक रूप है। इसका दूसरा रूप अवांछनीय या सांसारिक दृश्यों को देखने का तीव्र आकर्षण है। प्रवचन के उपरान्त जैन विश्व भारती द्वारा मुनि जय कुमार जी की कृति 'उसको' पुस्तक आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित की गई।