पुज्य प्रवर ने 'अनुप्रेक्षा से क्या मिलेगा' विषय पर प्रदान किया पावन पाथेय

लाडनूं। 31 अगस्त, 2026
जन-जन की आस्था के केंद्र, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को स्वाध्याय के चौथे अंग ‘अनुप्रेक्षा से क्या मिलेगा?’ विषय पर अमृत देशना प्रदान की।
स्वाध्याय की श्रृंखला में अनुप्रेक्षा का स्थान व अचिंतन की गति:
१. स्वाध्याय के चरण : पूज्य आचार्यश्री ने फरमाया कि स्वाध्याय के पाँच अंगों में चौथा अंग 'अनुप्रेक्षा' है। सर्वप्रथम वाचना प्राप्त होती है, जहाँ ज्ञान देने वाला तत्त्व बोध प्रदान करता है। ज्ञान में जिज्ञासा होने पर प्रतिपृच्छना की जाती है, और प्राप्त ज्ञान का पुनरावर्तन करना परिवर्तना कहलाता है। इसके उपरांत चौथा अंग अनुप्रेक्षा आता है।
२. चिंतन से अचिंतन की ओर: अनुप्रेक्षा का अर्थ है— चिंतन, तत्त्व चिंतन और अर्थ चिंतन। चिंतन तो साधना की एक स्थूल स्थिति है, उससे भी आगे साधक को चिंतन से अचिंतन की ओर गति करनी चाहिए। चिंतन से अचिंतन की ओर, शब्द से अशब्द की ओर, और तर्क से अतर्क की ओर गति हो जाना साधना की उच्च स्थिति होती है। चिंतन में गहराई और एकाग्रता लाने के लिए अचिंतन की भी बड़ी उपयोगिता होती है।
३. अनित्य अनुप्रेक्षा और वैराग्य: प्रेक्षाध्यान पद्धति में भी अनित्य अनुप्रेक्षा, अभय की अनुप्रेक्षा और सहिष्णुता की अनुप्रेक्षा जैसे प्रयोग किए जाते हैं। अनित्यता का बोध कराने वाली अनेक गीतिकाएँ शास्त्र में वर्णित हैं। इन गीतिकाओं के संगान से जब मन में अनित्यता का भाव स्फुरित होता है, तो साधक के भीतर वैराग्य की पावन चेतना जागृत हो उठती है।
अनुप्रेक्षा से जीव को प्राप्त होने वाले ६ महान आगमिक लाभ :
शास्त्र में पूछे गए प्रश्न 'अनुप्रेक्षा से जीव क्या प्राप्त करता है?' का उत्तर देते हुए पूज्य प्रवर ने इसके ६ मुख्य लाभों का विस्तार से विवेचन किया।
१. कर्म बंधनों की शिथिलता : अनुप्रेक्षा के प्रभाव से जीव के आयुष्य कर्म को छोड़कर शेष सात कर्मों के गाढ़ बंधन शिथिल पड़ जाते हैं।
२. दीर्घकालीन स्थिति का क्षय : कर्मों की जो बहुत लंबी काल-स्थिति बंधी हुई होती है, अनुप्रेक्षा द्वारा वह स्थिति घट जाती है।
३. रस का मंद होना : कर्मों का जो फल या विपाक अत्यंत तीव्र रूप में आने वाला था, अनुप्रेक्षा के प्रभाव से वह मंद विपाक में परिवर्तित हो जाता है।
४. प्रदेशों का रूपान्तरण : कर्मों के बहु-प्रदेशों (अधिक कर्म परमाणु) का अल्प-प्रदेशों में रूपान्तरण हो जाता है।
५. असातवेदनीय कर्म से बचाव (करुणा की चेतना) : आयुष्य कर्म कभी बंधता है और कभी नहीं बंधता, किंतु अनुप्रेक्षा करने वाला जीव अनित्यता का चिंतन करता है कि यह शरीर, संबंध और बाहरी संयोग सब अनित्य हैं; केवल मेरी आत्मा शाश्वत है जो ज्ञान-दर्शन युक्त है। बाह्य भावों का वियोग निश्चित जानकर उसके भीतर करुणा व अनुकंपा की चेतना जाग जाती है। अनुकंपा से युक्त व्यक्ति किसी जीव को कष्ट नहीं देता, जिससे वह कई पापों से बच जाता है। 
६. संसार-कान्तार का अतिक्रमण (मोक्ष प्राप्ति) : अनुप्रेक्षा करने वाला साधक इस चार गतियों वाले भयानक संसार रूपी अरण्य (जंगल) को शीघ्र ही पार कर जाता है और मोक्ष की परम गति को प्राप्त कर लेता है।